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जीवन से जुड़े वेदों के श्लोक....

।। सं गच्छध्वम् सं वदध्वम्।। (ऋग्वेद 10.181.2) अर्थात: साथ चलें मिलकर बोलें। उसी सनातन मार्ग का अनुसरण करो जिस पर पूर्वज चले हैं।    दार्शनिकों, संतों, साहित्यकारों, नीतिज्ञों और वैज्ञानिकों के विचारों को पढ़कर जीवन में बहुत लाभ मिलता है। मौर्यकाल में जहां नीतिज्ञों में चाणक्य का नाम विख्यात था, वहीं दार्शनिकों और मनोवैज्ञानिकों में पाणिनी और पतंजलि का नाम सम्मान के साथ लिया जाता था। वैज्ञानिकों में पिङ्गल, वाग्भट्ट, जीवक आदि महान वैज्ञानिक थे। हालांकि इसके पूर्व महाभारत काल में तो और भी महानतम लोग थे। धर्म, ज्ञान और विज्ञान के मामले में भारत से ज्यादा समृद्धशाली देश कोई दूसरा नहीं। भारत ने दुनिया को सभी तरह का ज्ञान दिया और आज उस ज्ञान के कारण पश्‍चिम और चीन जगत के लोग अपना जीवनस्तर सुधारने में लगे हैं, लेकिन भारत तो अभी विकासशील देश ही बना हुआ है। यहां धार्मिक कट्टरता और राजनीतिक अपरिपक्वता ही अधिक देखने को मिलती है। फिर भी भारतीय बुद्धि का दुनिया में लोहा माना जाने लगा है तो उसी ज्ञान के बल पर जो हमारे ऋषि और मुनि हमें दे गए हैं। हालांकि हमने वेद और संस्कृत के ऐसे...

संस्कृत श्लोक

(संस्कृत श्लोक) यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः।  तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।  भावार्थ : घिसने, काटने, तापने और पीटने, इन चार प्रकारों से जैसे सोने का परीक्षण होता है, इसी प्रकार त्याग, शील, गुण, एवं कर्मों से पुरुष की परीक्षा होती है । यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥  भावार्थ : जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है । सत्य -सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।  सत्यमूलनि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥  भावार्थ : सत्य ही संसार में ईश्वर है; धर्म भी सत्य के ही आश्रित है; सत्य ही समस्त भव - विभव का मूल है; सत्य से बढ़कर और कुछ नहीं है । पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत: ।  पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ।।  भावार्थ : भरतश्रेष्ठ ! पिता , माता अग्नि ,आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियो...

शिवलिंग का अर्थ

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                            शिवलिंग प्रकृति से शिवलिंग का क्या संबंध है ..? जाने शिवलिंग का वास्तविक अर्थ क्या है और कैसे इसका गलत अर्थ निकालकर हिन्दुओं को भ्रमित किया...??  कुछ लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते हैं..। छोटे छोटे बच्चों को बताते हैं कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते हैं । मूर्खों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..और अपने छोटे'छोटे बच्चों को हिन्दुओं के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते हैं।संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है । इसे देववाणी भी कहा जाता है। *लिंग* लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह, प्रतीक होता है… जबकी जनर्नेद्रीय को संस्कृत मे शिशिन कहा जाता है। *शिवलिंग* >शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक…. >पुरुषलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग ...

मित्रता दिवस पर अनमोल वचन*

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* 👉मित्रता दिवस पर अनमोल वचन * * जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। * * तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ * * निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥1॥ * जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥1॥ * जिन्ह कें असि मति सहज न आई। * * ते सठ कत हठि करत मिताई॥ * * कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥2॥ * जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे॥2॥ * देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥ * * बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥3॥ * देने-लेने में मन में शंका न रखे। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्ति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये हैं॥3॥ * आगें कह ...

ईश्वर का अंश जीव

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ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥ सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥ जीव ईश्वर का अंश है। (अतएव) वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है॥ वह माया के वशीभूत होकर तोते और वानर की भाँति अपने आप ही बँध गया। मित्रो, ईश्वर न तो दूर है और न अत्यंत दुर्लभ ही है, बोध स्वरूप एकरस अपना आत्मा ही परमेश्वर है, नाम और रूप विभिन्न दिखते हैं, मगर वह अनामी, अरूप एक ही है, ईश्वर का और हमारा संबंध अमिट है, जीव ईश्वर का अविनाशी अंश है, जैसे आकाश व्यापक है ऐसे ही परमात्मा व्यापक है, जो चैतन्य परमात्मा सगुण-साकार में है, वही आपकी और हमारी की देह में है। वह नित्य परमेश्वर अपने से रत्ती भर भी दूर नहीं है क्योंकि वह व्यापक है, सर्वत्र है, सदा है, सज्जनों! आपने वो घटना सुनी होगी, स्वामी राम कृष्ण परमहंसजी के पास एक युवक आया, गुरूदेव मुझे भगवद् दर्शन करना है, आप करवा सकते हो? बोले क्यो नहीं? परमहंसजी उसको गंगा स्नान कराने ले गये, जैसे ही गंगा में डुबकी लगाई तो परमहंसजी उसकी पीठ पर बैठ गये, वो अकुलाने लगा। पूरे प्राणों की ताकत लगा कर जैसे-तैसे ऊपर निकला, युवक ने ...

कांवड़ यात्रा कब शुरू हुई, किसने की, क्या उद्देश्य है, जानिए अनजाना तथ्य!!!

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कांवड़ यात्रा कब शुरू हुई, किसने की, क्या उद्देश्य है, जानिए अनजाना तथ्य !!!!!!! भगवान भोलेनाथ का ध्यान जब हम करते हैं तो श्रावण का महीना, रूद्राभिषेक और कांवड़ का उत्सव आंखों के सामने आता है। लेकिन कांवड़ यात्रा कब शुरू हुई, किसने की, क्या उद्देश्य है इसका, भारत के किन क्षेत्रों में यह यात्रा होती है, आइए,जानें। अलग अलग जगहों की अलग मान्यताएं रही हैं, ऐसा मानना है कि सर्वप्रथम भगवान परशुराम ने कांवड़ लाकर “पुरा महादेव”, में जो उत्तर प्रदेश प्रांत के बागपत के पास मौजूद है, गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाकर उस पुरातन शिवलिंग पर जलाभिषेक, किया था।  आज भी उसी परंपरा का अनुपालन करते हुए श्रावण मास में गढ़मुक्तेश्वर, जिसका वर्तमान नाम ब्रजघाट है, से जल लाकर लाखों लोग श्रावण मास में भगवान शिव पर चढ़ाकर अपनी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। उत्तर भारत में भी गंगाजी के किनारे के क्षेत्र के प्रदेशों में कांवड़ का बहुत महत्व है। राजस्थान के मारवाड़ी समाज के लोगों के यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहित जो जल लाते थे और प्रसाद के साथ जल देते थे, उन्हें कांवड़िये कहते थे...

सत्य से बढकर और कुछ नहीं है।

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* नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् । न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते ॥ सत्य जैसा अन्य धर्म नहीं । सत्य से पर कुछ नहीं । असत्य से ज्यादा तीव्रतर कुछ नहीं । संसार में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सदा सत्यभाषण तथा सत्य का ही आचरण करते हैं ।* *अधिकांश लोग अवसर आते ही झूठ का प्रयोग करते हैं। वे समझते हैं कि झूठ बोलना लाभदायक है , और सत्य बोलना बहुत कठिन और कष्टदायक है। इसलिए प्रायः लोग जल्दी से झूठ बोल देते हैं , मिथ्या आचरण करते हैं ।* *परंतु जो गंभीर चिंतक होते हैं , वे दूर तक सोचते हैं।  झूठ के दुष्परिणामों = चिंता तनाव भय आदि को समझ लेते हैं , इसलिए मिथ्या चरण नहीं करते,  मिथ्या भाषण नहीं करते,  और सत्य का ही प्रयोग करते हैं । वे निश्चिंत तनावमुक्त आनंदित निर्भय होकर जीवन जीते हैं। आप भी इन बातों का चिंतन करें । झूठ से बचने का प्रयास करें, सत्य का आचरण करें तथा सदा निर्भय होकर जिएँ। *जीव मात्र सुख चाहता है ।सुख भी ऐसा जो सर्वदा मिले सर्वत्र मिले और सब से मिले जिसके लिए परिश्रम न करना पड़े। जो पराधीन न हो एवं जिसका भान होता रहे इतनी उच्च कोटि की महत्वाकांक...